Aapatkal Mein Gujarat — Page 204

Original Hindi OCR

गुजरने की अदम्य इच्छा होने के बावजूद हाथ बाँधे बैठे रहना पड़ता है। ऐसी
स्थिति मनुष्य को व्याकुल कर देती है और यह स्वाभाविक भी है। हालाँकि जेलों
में जो बंद लोग एक साल से कष्टों को झेल रहे हैं, वे मेरी दृष्टि में तो साक्षात् कृति-
स्वरूप ही हैं। कृति का प्रकटीकरण भिन्न-भिन्न स्वरूपों में होता है, किंतु मूलतः
तो वह कृति ही होती है ध्येय की प्राप्ति हेतु हर कष्ट सहकर, किसी भी कौमत पर
अपनी टेक पर अडिग बने रहना, यह अपेक्षा किसी भी यशस्वी कार्यकर्ता से होती
है। उसी अपेक्षा की पूर्ति आज जो जेलों में हैं उनसे हो रही है, तो क्या यह कृति
का ही साक्षात् स्वरूप नहीं है !

शब्दों को प्रत्यक्ष तपस्या का संबल प्राप्त हो तभी उन शब्दों का प्रभाव भी
सटीक होता है।इस देश में इस देश की परंपरा अखंड रहेगी । हम किसी भी कीमत
पर उसे बनाए रखेंगे।'--इस निर्धार का आधार Grae शब्द मात्र नहीं, किंतु
पिछले एक वर्ष से जेलों में रहकर कष्ट झेल रहे हजारों भाइयों की तपस्या से
प्रतीति समाज को होगी कि यह निर्धार कृतनिश्चयी वृत्ति का एक घोष है, और
समाज की सुषुप्त शक्ति जागेगी, विराट् जागेगा। महान् ध्येय की प्राप्ति के लिए
महाप्रयत्नों की आवश्यकता होती है, यह हम सभी का अनुभव है। अपनी ओर से
हम कोई कसर नहीं छोड़ेंगे, यह हम सभी का संकल्प है।

लोग “मीसा' की कल्पना मात्र से थरथराते हैं, किंतु ऐसी तपिशों को सहने
पर ही तो हमारी निष्ठा के प्रति समाज में विश्वसनीयता प्रबल होगी।

ऐसे निर्धार को समाज के जितने अधिक व्यक्तियों में जितना अधिक तीकत्र
बनाने में हम सफल होंगे, राष्ट्र-जीवन में परिवर्तन लाने के अपने लक्ष्य को हम
उतनी ही शीघ्रता से प्राप्त कर सकें गे। इस बात को समझ सकनेवाले जागरूक
नागरिकों की ही आज आवश्यकता है, शेष युक्तियाँ-प्रयुक्तियाँ तो तात्क्षणिक
परिस्थितियों से निपटने का साधन मात्र ही हैं। जैसा कि संपूर्ण विश्व का अनुभव
है कि जिस राष्ट्र की आंतरिक शक्ति श्रेष्ठ होती है वही राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय राजनीति
में भी सार्थक भूमिका निभा सकता @ श्रेष्ठ आंतरिक शक्ति-विहीन राष्ट्र के मंतव्य
अंतरराष्ट्रीय पटल पर योग्य महत्त्व अर्पित नहीं कर पाते। उनके विचारों को पोली
पंडिताई माना जाता है। उसी प्रकार राष्ट्र के आंतरिक जीवन में भी जिस विचार को
नागरिकों का सक्रिय सहयोग प्राप्त होता है, वही विचार व्यावहारिक सफलता प्राप्त
कर पाता है, शेष विचारों को तो लोग निरर्थक पोथी-पंडिताई ही मानते हैं। अपनी
इस भूमिका से नागरिकों में उचित संस्कारों का सर्जन करने के हमने अब तक जो
अथक प्रयत्न किए हैं, उसके सुंदर फल, सुंदर परिणाम आज हमारे सामने हैं।

# आपातकाल में गुजरात ऋ% OK

English translation

[Translation failed for this section.]

गुजरने की अदम्य इच्छा होने के बावजूद हाथ बाँधे बैठे रहना पड़ता है। ऐसी
स्थिति मनुष्य को व्याकुल कर देती है और यह स्वाभाविक भी है। हालाँकि जेलों
में जो बंद लोग एक साल से कष्टों को झेल रहे हैं, वे मेरी दृष्टि में तो साक्षात् कृति-
स्वरूप ही हैं। कृति का प्रकटीकरण भिन्न-भिन्न स्वरूपों में होता है, किंतु मूलतः
तो वह कृति ही होती है ध्येय की प्राप्ति हेतु हर कष्ट सहकर, किसी भी कौमत पर
अपनी टेक पर अडिग बने रहना, यह अपेक्षा किसी भी यशस्वी कार्यकर्ता से होती
है। उसी अपेक्षा की पूर्ति आज जो जेलों में हैं उनसे हो रही है, तो क्या यह कृति
का ही साक्षात् स्वरूप नहीं है !

शब्दों को प्रत्यक्ष तपस्या का संबल प्राप्त हो तभी उन शब्दों का प्रभाव भी
सटीक होता है।इस देश में इस देश की परंपरा अखंड रहेगी । हम किसी भी कीमत
पर उसे बनाए रखेंगे।'--इस निर्धार का आधार Grae शब्द मात्र नहीं, किंतु
पिछले एक वर्ष से जेलों में रहकर कष्ट झेल रहे हजारों भाइयों की तपस्या से
प्रतीति समाज को होगी कि यह निर्धार कृतनिश्चयी वृत्ति का एक घोष है, और
समाज की सुषुप्त शक्ति जागेगी, विराट् जागेगा। महान् ध्येय की प्राप्ति के लिए
महाप्रयत्नों की आवश्यकता होती है, यह हम सभी का अनुभव है। अपनी ओर से
हम कोई कसर नहीं छोड़ेंगे, यह हम सभी का संकल्प है।

लोग “मीसा' की कल्पना मात्र से थरथराते हैं, किंतु ऐसी तपिशों को सहने
पर ही तो हमारी निष्ठा के प्रति समाज में विश्वसनीयता प्रबल होगी।

ऐसे निर्धार को समाज के जितने अधिक व्यक्तियों में जितना अधिक तीकत्र
बनाने में हम सफल होंगे, राष्ट्र-जीवन में परिवर्तन लाने के अपने लक्ष्य को हम
उतनी ही शीघ्रता से प्राप्त कर सकें गे। इस बात को समझ सकनेवाले जागरूक
नागरिकों की ही आज आवश्यकता है, शेष युक्तियाँ-प्रयुक्तियाँ तो तात्क्षणिक
परिस्थितियों से निपटने का साधन मात्र ही हैं। जैसा कि संपूर्ण विश्व का अनुभव
है कि जिस राष्ट्र की आंतरिक शक्ति श्रेष्ठ होती है वही राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय राजनीति
में भी सार्थक भूमिका निभा सकता @ श्रेष्ठ आंतरिक शक्ति-विहीन राष्ट्र के मंतव्य
अंतरराष्ट्रीय पटल पर योग्य महत्त्व अर्पित नहीं कर पाते। उनके विचारों को पोली
पंडिताई माना जाता है। उसी प्रकार राष्ट्र के आंतरिक जीवन में भी जिस विचार को
नागरिकों का सक्रिय सहयोग प्राप्त होता है, वही विचार व्यावहारिक सफलता प्राप्त
कर पाता है, शेष विचारों को तो लोग निरर्थक पोथी-पंडिताई ही मानते हैं। अपनी
इस भूमिका से नागरिकों में उचित संस्कारों का सर्जन करने के हमने अब तक जो
अथक प्रयत्न किए हैं, उसके सुंदर फल, सुंदर परिणाम आज हमारे सामने हैं।

# आपातकाल में गुजरात ऋ% OK

Scanned page

Click the scan to open the full-size page image.

Scan of page 204