Aapatkal Mein Gujarat — Page 187

Original Hindi OCR

कहीं भी जाने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उनका घर हम लोगों के लिए
चौबीसों घंटे खुला रहता था। श्री के.जी. प्रभु आदि के साथ मुलाकातें उन्हीं के
घर पर की जाती थीं।

श्री बाबूभाई पटेल को गिरफ्तार करने से पहले भी उनपर निगरानी रखने के
लिए पुलिस की वैन हमेशा उनके साथ रहती et | उनसे विचार-विमर्श करना हमारे
लिए कई बार आवश्यक हो जाता था। किंतु उनसे मिलने में कई खतरे थे, अतः
पत्रों के माध्यम से ही उनसे संपर्क करना पड़ता था। इस समस्या से निपटने के लिए
गुजरात के ही एक और सपूत की मदद ली गई। वे थे गुजरात विद्यापीठ के श्री
धीरूभाई देसाई। वह सार्वजनिक जीवन में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्ति थे; किंतु
अभिमान का नामोनिशान तक नहीं था उनमें | बाबूभाई तथा हमारे बीच संपर्क सूत्र
बनने की जिम्मेदारी उन्होंने ले ली। मुझ जैसे कार्यकर्ता के पत्र भी वे बाबूभाई से
स्वयं मिलकर हाथोहाथ पहुँचा देते थे तथा उस पत्र का उत्तर भी ले आते थे। श्रेष्ठ
लक्ष्य को सिद्ध करने के लिए उससे जुड़े हर काम को महत्त्वपूर्ण मानना चाहिए--
इस बात को उन्होंने अपने आचरण से साबित कर दिखाया था।

आपातस्थिति को लेकर असंतुष्ट कांग्रेसियों का एक छोटा सा गुट गुजरात
में भी था। इस संघर्ष में उनका सहयोग पाने के लिए उनसे संपर्क करना आवश्यक
था। इस हेतु हमने प्रयल किए। कहीं सफलता मिली और कहीं विफलता । पत्रकार
व सक्रिय कार्यकर्ता श्री विद्युत ठाकर ने भी इस संघर्ष हेतु लोगों से प्रत्यक्ष या
अप्रत्यक्ष संपर्क करवाने में हमारी सहायता की थी। श्री के.डी. देसाई, श्री जयंतीभाई
पटेल इत्यादि तो हमारे नियमित साथी बन चुके थे। हर नई परिस्थिति, नई योजना,
नए समाचार इत्यादि के बारे में विचार-विमर्श हेतु उनके साथ बैठकें करना हमारा
नित्यकर्म बन चुका था। सक्रिय कार्यकर्ताओं तक दिल्ली से “सत्य समाचार!
पहुँचाते रहने के लिए उन्होंने बहुत परिश्रम किया था। इस प्रकार समाज के विभिन्न
क्षेत्रों के निडर प्रतिनिधियों ने भूमिगत योजनाओं को सफल करने हेतु संपर्क तथा
समाचार प्रसार के कार्यो में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

पुलिस निगरानी से सदा घिरे रहनेवाले केशुभाई, हेमा बहन इत्यादि से
मिलने में हमें बहुत कठिनाई होती थी। सरकार जानती थी कि भूमिगत कार्यकर्ता
केशुभाई तथा हेमा बहन से संपर्क करने के प्रयत्त अवश्य करेंगे, अत: उनकी
गतिविधियों पर सरकार हमेशा आँखें गड़ाए रहती थी। भूमिगत प्रवृत्ति का राजनीतिक
मोरचा सँभालनेवाले नाथाभाई उनसे मिलने के लिए नई-नई योजनाएँ बनाते रहते
थे। इन योजनाओं के अनुसार नजरबंदी केशुभाई, कभी मीसाग्रस्त परिवारों से
१८८ # आपातकाल में गुजरात %

English translation

[Translation failed for this section.]

कहीं भी जाने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उनका घर हम लोगों के लिए
चौबीसों घंटे खुला रहता था। श्री के.जी. प्रभु आदि के साथ मुलाकातें उन्हीं के
घर पर की जाती थीं।

श्री बाबूभाई पटेल को गिरफ्तार करने से पहले भी उनपर निगरानी रखने के
लिए पुलिस की वैन हमेशा उनके साथ रहती et | उनसे विचार-विमर्श करना हमारे
लिए कई बार आवश्यक हो जाता था। किंतु उनसे मिलने में कई खतरे थे, अतः
पत्रों के माध्यम से ही उनसे संपर्क करना पड़ता था। इस समस्या से निपटने के लिए
गुजरात के ही एक और सपूत की मदद ली गई। वे थे गुजरात विद्यापीठ के श्री
धीरूभाई देसाई। वह सार्वजनिक जीवन में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्ति थे; किंतु
अभिमान का नामोनिशान तक नहीं था उनमें | बाबूभाई तथा हमारे बीच संपर्क सूत्र
बनने की जिम्मेदारी उन्होंने ले ली। मुझ जैसे कार्यकर्ता के पत्र भी वे बाबूभाई से
स्वयं मिलकर हाथोहाथ पहुँचा देते थे तथा उस पत्र का उत्तर भी ले आते थे। श्रेष्ठ
लक्ष्य को सिद्ध करने के लिए उससे जुड़े हर काम को महत्त्वपूर्ण मानना चाहिए--
इस बात को उन्होंने अपने आचरण से साबित कर दिखाया था।

आपातस्थिति को लेकर असंतुष्ट कांग्रेसियों का एक छोटा सा गुट गुजरात
में भी था। इस संघर्ष में उनका सहयोग पाने के लिए उनसे संपर्क करना आवश्यक
था। इस हेतु हमने प्रयल किए। कहीं सफलता मिली और कहीं विफलता । पत्रकार
व सक्रिय कार्यकर्ता श्री विद्युत ठाकर ने भी इस संघर्ष हेतु लोगों से प्रत्यक्ष या
अप्रत्यक्ष संपर्क करवाने में हमारी सहायता की थी। श्री के.डी. देसाई, श्री जयंतीभाई
पटेल इत्यादि तो हमारे नियमित साथी बन चुके थे। हर नई परिस्थिति, नई योजना,
नए समाचार इत्यादि के बारे में विचार-विमर्श हेतु उनके साथ बैठकें करना हमारा
नित्यकर्म बन चुका था। सक्रिय कार्यकर्ताओं तक दिल्ली से “सत्य समाचार!
पहुँचाते रहने के लिए उन्होंने बहुत परिश्रम किया था। इस प्रकार समाज के विभिन्न
क्षेत्रों के निडर प्रतिनिधियों ने भूमिगत योजनाओं को सफल करने हेतु संपर्क तथा
समाचार प्रसार के कार्यो में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

पुलिस निगरानी से सदा घिरे रहनेवाले केशुभाई, हेमा बहन इत्यादि से
मिलने में हमें बहुत कठिनाई होती थी। सरकार जानती थी कि भूमिगत कार्यकर्ता
केशुभाई तथा हेमा बहन से संपर्क करने के प्रयत्त अवश्य करेंगे, अत: उनकी
गतिविधियों पर सरकार हमेशा आँखें गड़ाए रहती थी। भूमिगत प्रवृत्ति का राजनीतिक
मोरचा सँभालनेवाले नाथाभाई उनसे मिलने के लिए नई-नई योजनाएँ बनाते रहते
थे। इन योजनाओं के अनुसार नजरबंदी केशुभाई, कभी मीसाग्रस्त परिवारों से
१८८ # आपातकाल में गुजरात %

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