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संपर्क तथा समाचार प्रसार
देश भर के सच्चे समाचारों से सभी को अवगत करवाने के उद्देश्य से
भूमिगत वार्त्ता-पत्रों की एक व्यवस्था बनाई गई थी। इन वार्त्ता-पत्रों के आधार पर
ही हर प्रांत में भूमिगत समाचार-पत्रिकाएँ तैयार की जाती थीं। अंग्रेजी तथा हिंदी
भाषा में छापे जानेवाले इन वार्त्ता-पत्रों में राज्य का राजनीतिक परिदृश्य, कांग्रेस की
आंतरिक गतिविधियों, प्रजा की मन:स्थिति, जेलों के समाचार, प्रतिकार के कार्यक्रम
इत्यादि जानकारियों का समावेश किया जाता था। इन वार्त्ता-पत्रों को विभिन्न प्रांतों
के निश्चित भूमिगत केंद्रों पर अंतरप्रांतीय संदेशवाहकों के माध्यम से पहुँचाया
जाता था। भारत के बारे में सच्चे समाचारों की विदेशों में भी बहुत माँग थी। अतः
इस हेतु भी योजना बनाई गई थी। विभिन्न रास्तों से ये समाचार-पत्रिकाएँ तथा
वार्त्ता-पत्र विदेशों को पहुँचाए जाते थे। गुजरात से बाहर भेजी जा रही समाचार-
पत्रिकाओं में गुजरात के छोटे-से-छोटे गाँव के समाचारों का भी समावेश हो सके,
इसके लिए गुजरात में प्रांत स्तर पर भी समाचार प्रसार-तंत्र बनाया गया था। इस तंत्र
के जरिए समाचारों को एकत्रित कर भारत के अन्य राज्यों तथा विश्व के कई देशों
में भेजा जाता था।
समाचारों को एकत्रित कर Gujarat News Bulletin dan करे में सुप्रसिद्ध
पत्रकार तथा पहले दौर के स्वातंत्र्य-संग्राम के समय से ही देश-सेवा में लगे श्री
देवेंद्रभाई ओझा (वनमाव्ठी वांको '--' संदेश ') का योगदान उल्लेखनीय रहा था।
पत्रकार होने के नाते, स्वाभाविक रूप से, उन्हें विभिन्न समाचार मिलते रहते थे;
इसके अलावा भूमिगत तंत्र के माध्यम से भी उन्हें ढेरों समाचार पहुँचाए जाते थे।
साठ साल पूरे कर चुके श्री देवुभाई न्यूज बुलेटिन को संपादित करने के बाद कड़ा
परिश्रम कर तथा रात-रात भर जागकर, हमारे न चाहने पर भी, अपने हाथों पत्रिका
टाइप करते और उसकी अनेक प्रतियाँ भी बनाते थे। यह सब वे केवल इसलिए
करते थे, क्योंकि अपनों द्वारा थोपी गई गुलामी से वे अत्यंत व्यथित थे। अपना
आक्रोश व्यक्त करने के लिए ही वे संघर्ष से जुड़ा कोई भी कार्य पूरे जुनून के साथ
करने को तत्पर रहते थे। कई बार तो ' मुक्तवाणी ' का वितरण करने के लिए वे इस
उम्र में भी साइकिल लेकर निकल पड़ते थे। देवुभाई की इच्छा से ही उनके मौसा
प्रताप और मौसी ज्योति का घर हमारी गुप्त बैठकों का स्थान बन गया था।
भूमिगत समाचार-पत्रिकाओं के लिए अधिक-से-अधिक समाचारों को
जुटाने में 'जनसत्ता' के संपादक श्री वासुदेवभाई मेहता का बड़ा योगदान था। पूरे
संघर्ष काल के दौरान वे हमें सहयोग देते रहे थे। बड़े साहसी थे। हमारे साथ
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