Aapatkal Mein Gujarat — Page 184

Original Hindi OCR

सच्चे समाचारों के ब्लैक आउट से धूमिल पड़ती जा रही लोक-चेतना को जगाए
रखना भी अत्यावश्यक था। इस हेतु विपुल मात्रा में साहित्य तैयार कर लोगों तक
पहुँचाया जाता था। गुजरात सरकार के गिरने के बाद भी भूमिगत कार्यकर्ताओं को
पकड़ने में वांछित सफलता न मिलने पर सरकार ने अखबारों तथा रेडियो के
माध्यम से इन कार्यकर्ताओं को 'भगोड़ा' घोषित कर अपप्रचार करना शुरू कर
दिया। सरकार के इस अपप्रचार का खेड़ा जिले से एक भूमिगत पुस्तिका प्रकाशित
कर मुँहतोड़ जवाब दिया गया, 'हम जीवन-मूल्यों की पुन:स्थापना के उद्देश्य से
संघर्ष करनेवाले बलिदानी हैं | अन्याय के are में रहते हुए भी हम इस अन्याय के
पैर उखाड़कर ही मानेंगे। हम भी तुम्हें चुनौती देते हैं कि हमें पकड़ लो--यदि
पकड़ सकते हो तो !' यह पुस्तिका कई सरकारी अधिकारियों को भेजी गई। दीवारों
पर भी चिपकाई गई।
भूमिगत साहित्य के तीन प्रकार थे। लोगों तक समाचारों को पहुँचाने के
लिए मुखपत्र के प्रकार की पत्रिका प्रकाशित की जाती थी। गुजरात में ' मुक्तवाणी '
नामक पत्रिका प्रकाशित होती थी। इसके लिए सामग्री इकट्ठा करके पत्रिका की
तीन, चार व पाँच पांडुलिपियाँ तैयार की जाती थीं। उन पांडुलिपियों को गुजरात में
भिन्न-भिनन स्थानों पर भेजकर उन्हें छपवाया जाता था। पत्रिका का हर अंक किसी
नए प्रेस में छपता था। कई बार प्रेसवालों को अधिक कीमत चुकाकर भी पत्रिका
को छपवाना पड़ता था। पत्रिकाओं को छपवाने के बाद उन्हें निश्चित संख्या में
विभिन्न भूमिगत केंद्रों को भेजा जाता था। बंबई में रहनेवाले गुजरातियों के लिए
इस पत्रिका को वहाँ भी भेजा जाता था। संघ के कार्यकर्ता अपने हाथों ही इन
पत्रिकाओं को पहुँचाते थे। गुजरात के हर गाँव में नियमित रूप से ये पत्रिकाएँ
पहुँचाई जाती थीं। पुलिस.को अँधेरे में रखने के लिए पत्रिका के प्रकाशन की तिथि
जान-बूझकर अनिश्चित रखी जाती थी तथा पत्रिका की छपाई एवं वितरण का
कार्य दो ही दिनों में निपटा दिया जाता था। भूमिगत साहित्य की टोह लेते हुए
पुलिस कभी भी, किसी भी प्रिंटिंग प्रेस पर पहुँच जाया करती थी। एक बार एक
प्रेस में “मुक्तवाणी' की छपाई का काम चल रहा था कि तभी पुलिस के एक
सिपाही ने गुप्त वेश में वहाँ पहुँचकर प्रेस मालिक को ' मुक्तबाणी ' का एक पुराना
अंक दिखाते हुए कहा कि वह“ लोक संघर्ष समिति' का कार्यकर्ता है तथा उसे उस
पत्रिका की और प्रतियाँ छपवानी हैं। प्रेस मालिक सतर्क थे। उन्होंने पुलिस के उस
कर्मचारी को डपट दिया तथा स्वयं मानो परम सरकार-भक्त हों, वैसे उस खुफिया
पुलिसवाले को गिरफ्तार करवा देने की धमकी भी दे डाली। जाँच करने के लिए
# आपातकाल में गुजरात * श्८५

English translation

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सच्चे समाचारों के ब्लैक आउट से धूमिल पड़ती जा रही लोक-चेतना को जगाए
रखना भी अत्यावश्यक था। इस हेतु विपुल मात्रा में साहित्य तैयार कर लोगों तक
पहुँचाया जाता था। गुजरात सरकार के गिरने के बाद भी भूमिगत कार्यकर्ताओं को
पकड़ने में वांछित सफलता न मिलने पर सरकार ने अखबारों तथा रेडियो के
माध्यम से इन कार्यकर्ताओं को 'भगोड़ा' घोषित कर अपप्रचार करना शुरू कर
दिया। सरकार के इस अपप्रचार का खेड़ा जिले से एक भूमिगत पुस्तिका प्रकाशित
कर मुँहतोड़ जवाब दिया गया, 'हम जीवन-मूल्यों की पुन:स्थापना के उद्देश्य से
संघर्ष करनेवाले बलिदानी हैं | अन्याय के are में रहते हुए भी हम इस अन्याय के
पैर उखाड़कर ही मानेंगे। हम भी तुम्हें चुनौती देते हैं कि हमें पकड़ लो--यदि
पकड़ सकते हो तो !' यह पुस्तिका कई सरकारी अधिकारियों को भेजी गई। दीवारों
पर भी चिपकाई गई।
भूमिगत साहित्य के तीन प्रकार थे। लोगों तक समाचारों को पहुँचाने के
लिए मुखपत्र के प्रकार की पत्रिका प्रकाशित की जाती थी। गुजरात में ' मुक्तवाणी '
नामक पत्रिका प्रकाशित होती थी। इसके लिए सामग्री इकट्ठा करके पत्रिका की
तीन, चार व पाँच पांडुलिपियाँ तैयार की जाती थीं। उन पांडुलिपियों को गुजरात में
भिन्न-भिनन स्थानों पर भेजकर उन्हें छपवाया जाता था। पत्रिका का हर अंक किसी
नए प्रेस में छपता था। कई बार प्रेसवालों को अधिक कीमत चुकाकर भी पत्रिका
को छपवाना पड़ता था। पत्रिकाओं को छपवाने के बाद उन्हें निश्चित संख्या में
विभिन्न भूमिगत केंद्रों को भेजा जाता था। बंबई में रहनेवाले गुजरातियों के लिए
इस पत्रिका को वहाँ भी भेजा जाता था। संघ के कार्यकर्ता अपने हाथों ही इन
पत्रिकाओं को पहुँचाते थे। गुजरात के हर गाँव में नियमित रूप से ये पत्रिकाएँ
पहुँचाई जाती थीं। पुलिस.को अँधेरे में रखने के लिए पत्रिका के प्रकाशन की तिथि
जान-बूझकर अनिश्चित रखी जाती थी तथा पत्रिका की छपाई एवं वितरण का
कार्य दो ही दिनों में निपटा दिया जाता था। भूमिगत साहित्य की टोह लेते हुए
पुलिस कभी भी, किसी भी प्रिंटिंग प्रेस पर पहुँच जाया करती थी। एक बार एक
प्रेस में “मुक्तवाणी' की छपाई का काम चल रहा था कि तभी पुलिस के एक
सिपाही ने गुप्त वेश में वहाँ पहुँचकर प्रेस मालिक को ' मुक्तबाणी ' का एक पुराना
अंक दिखाते हुए कहा कि वह“ लोक संघर्ष समिति' का कार्यकर्ता है तथा उसे उस
पत्रिका की और प्रतियाँ छपवानी हैं। प्रेस मालिक सतर्क थे। उन्होंने पुलिस के उस
कर्मचारी को डपट दिया तथा स्वयं मानो परम सरकार-भक्त हों, वैसे उस खुफिया
पुलिसवाले को गिरफ्तार करवा देने की धमकी भी दे डाली। जाँच करने के लिए
# आपातकाल में गुजरात * श्८५

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