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झघड़ा, शंकरसिंह वाघेला, विष्णुभाई पंड्या तथा मैं नियमित रूप से मिलते रहते
थे; किंतु सरकार के गिरने के दूसरे ही दिन श्री विष्णुभाई पंड्या को पुलिस ने
गिरफ्तार कर लिया। भूमिगत रहते हुए अंत तक संघर्ष जारी रखने के पक्षधरों में से
गिरफ्तार होनेवाले वे प्रथम व्यक्ति थे। श्री विष्णुभाई की अच्छी तरह पूछताछ की
गई। हर नए गिरफ्तार होनेवाले से कई प्रकार के प्रश्न पूछे जाते थे और ये प्रश्न
भूमिगत कार्यकर्ताओं से संबंधित जानकारी के बारे में ही हुआ करते थे। घंटों
पूछताछ की जाती, पर एक भी कार्यकर्ता जरा सी भी चूक नहीं करता था।
गिरफ्तार होने के बावजूद पकड़े गए कार्यकर्ताओं के मनोबल पर कोई
प्रभाव नहीं पड़ा था। श्री विष्णुभाई ने गिरफ्तार होते ही अपने व्यक्तिगत अधिकारों
के लिए संघर्ष शुरू कर दिया। चूँकि वे पी-एच.डी. कर रहे थे, अतः उन्होंने
राज्यपाल को तार कर अपने लिए प्रथम दर्जे की माँग की। दूसरी ओर खंभान से
पकड़े गए कार्यकर्ताओं ने हथकड़ियाँ पहनने से इनकार कर दिया। अहमदाबाद में
गुनहगारों की तरह ही “मीसा' में गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं की भी तसवीरें
खींची जाती थीं। संघ के एक प्रमुख कार्यकर्ता डॉ. विनोद ने पुलिस स्टेशन में
तसवीर खींचने की प्रथा के खिलाफ जंग Se ch सरकार की हर कोशिश के
बावजूद उन्होंने तसवीर नहीं खिंचवाई। अंततः पुलिस को अपनी जिद छोड़नी
पड़ी। अधिकतर कार्यकर्ताओं ने बगैर सर्च वारंट के पुलिस को घर में घुसने तक
नहीं दिया। कई कार्यकर्ताओं ने ‘shan’ वारंट स्वयं देखे बगैर पुलिस वैन में बैठने
से मना कर दिया और पुलिस को वारंट दिखाने के लिए मजबूर कर दिया। डीसा के
हरिभाई प्रजापति जैसे संघ के कुछ कार्यकर्ताओं ने अपने पुलिस की हिरासत में
जाने की घटना को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करते हुए इसके बारे में पत्रिकाएँ
बँटवाईं और विशाल जन-समुदाय को एकत्रित कर सभी की उपस्थिति में अपनी
गिरफ्तारी दी। इस प्रकार लोगों तक निडरतापूर्ण व्यवहार का संदेश पहुँचाया।
अचानक होनेवाली इन गिरफ्तारियों ने कई परिवारों को हताश भी किया
था। जेल के दुःखों की चिंता से भी बढ़कर 'मीसा' की अनिश्चितकालीन कैद की
कल्पना मात्र हिम्मती-से-हिम्मती परिवारों को डिगा देने के लिए पर्याप्त थी। अतः
“मीसा' के कोड़े से अपने आपको बचाने के लिए संघर्षरत राजनीतिक दलों से जुड़े
कई लोगों ने अपने दलों से नाता तोड़ लेने जैसा हीनतापूर्ण रास्ता भी अपनाया। ऐसे
कार्यकर्ताओं के इस्तीफों के सूचना-विज्ञापनों की उन दिनों के अखबारों में भरमार
थी। कई कार्यकर्ताओं ने इस्तीफे की एक प्रति पुलिस स्टेशन व दूसरी प्रति गिरफ्तारियों
को प्रेरित करनेवाले कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को भेजकर किसी भी तरह अपनी जान
११८ # आपातकाल में गुजरात #