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के कंधार क्षेत्र के 'शेतकरी कामगरी ' पक्ष द्वारा किया हुआ अभियान, श्रमिक क्षेत्र
में भारतीय मजदूर संघ तथा सी.पी.एम. की ८70 द्वारा संघर्ष को दिया हुआ
योगदान, श्री तारकुंडे के नेतृत्व में मानवीय अधिकार तथा नागरिक स्वतंत्रता की
रक्षा के लिए निर्मित संस्था द्वारा हुआ कार्य, महिलाओं के क्षेत्र में ' राष्ट्र सेविका
समिति' द्वारा प्रदत्त सहयोग, विद्यार्थी क्षेत्र में विद्यार्थी परिषद् द्वारा दिया गया नेतृत्व
तथा दिशा-निर्देशन, ' आचार्य सम्मेलन' का विवरण तथा उस उपक्रम का तात्कालिक
परिस्थितियों पर हुआ परिणाम, वकीलों, शिक्षा-शास्त्रियों, भूतपूर्व न्यायाधीशों तथा
साहित्य-सेवियों आदि के yas, कॉमनवेल्थ कॉन्फरेंस के समय प्रतिनिधियों को
भारत की परिस्थितियों से अवगत कराने हेतु किए गए प्रयास, डी.एम.के. सरकार
का अप्रत्यक्ष सहयोग, संघर्षकाल में जम्मू-कश्मीर की मनोवृत्ति, जेलों में बंदियों
का हौसला बढ़ाने की दृष्टि से किए गए उपक्रम, पीड़ित परिवारों की सहायता
करने की पद्धतियाँ, निर्वाचन की घोषणा से पूर्व जनता पार्टी की स्थापना के लिए
किए गए प्रयास आदि कितने ही पहलू महत्त्वपूर्ण होते हुए भी अब तक अस्पष्ट
हैं--यहाँ तक कि 'लोक संघर्ष समिति' के कार्य का सुसूत्र इतिहास भी अब तक
प्रकाशित नहीं हुआ। संघर्षपर्व में किसी भी अखिल भारतीय राजनीतिक दल की
तुलना में जिस प्रादेशिक दल का योगदान अधिक शानदार रहा, उस अकाली दल
को भी नव साहित्य में उचित स्थान प्राप्त नहीं हो सका। यह संपूर्ण संघर्ष जिस
संगठन के आधार पर हो सका, उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के योगदान का
विवरण भी उपलब्ध नहीं है। संघ की प्रसिद्धिपराड्मुखता तथा लेखकों के पास
उसके कार्य की जानकारी का अभाव-ये दोनों कारण इस अपूर्णता के हो सकते
हैं । इन सभी बातों का विचार किया जाय तो यह कहना पड़ेगा कि संघर्ष का समग्र,
प्रमाणबद्ध तथा अधिकृत इतिहास अब तक प्रकाशित नहीं हुआ है।
इस संघर्ष में गुजरात का स्थान वैशिष्ट्यपूर्ण है। एक तो यह बात पर्याप्त
मात्रा में प्रस्तुत नहीं हुई कि गुजरात की 'नवनिर्माण समिति' ने आपातस्थिति के
पूर्व ही इस संघर्ष का वास्तविक सूत्रपात कर दिया था। जब आपातस्थिति घोषित
हुई, उस समय तीन राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें थीं, किंतु इनमें से गुजरात राज्य
सरकार ने ही तानाशाही का खुलकर विरोध किया और संघर्षकारियों का साथ
दिया। इस प्रदेश में उस समय साहित्य-निर्मिति आदि ऐसे कार्य हुए, जो अन्य
प्रदेशों में करना संभव नहीं था। 'साधना' तथा ' भूमिपुत्र' ने देश के वृत्तपत्रीय
इतिहास में एक नए गौरवशाली अध्याय का निर्माण किया। इस संघर्ष के अहिंसात्मक
तंत्र में गुजरात प्रारंभ से ही प्रशिक्षित था, क्योंकि महात्माजी व सरदार पटेल की
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